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Monday, February 14, 2011

कितने दफे दिल ने कहा दिल की सुनी कितने दफे

कितने दफे दिल ने कहा दिल की सुनी कितने दफे

वैसे तो तेरी ना भी मैंने ढूँढली अपनी खुशी

तू जो गर हां कहे तो बात होगी और ही

दिल ही रखने को कभी, ऊपर पर से सही

कह देना हां... कह देना ... हां ...यूँ ही

कितने दफे दिल ने कहा दिल की सुनी कितने दफे

कितने दफे हैरान हुआ मैं ये सोच के

उठती हैं इबादत की खुशबुएँ क्यों मेरे इश्क से

जैसे ही मेरे ओठ ये छु लेते हैं तेरे नाम को

लगे के सजदा किया कहे के तुझे शबद के बोल दू

के खुदाई छोड़ के फिर आजा तू जमी पे

और जा ना कही तू साथ रह जा मेरे



कितने दफे दिल ने कहा दिल की सुनी कितने दफे

कितने दफे मुझको लगा तेरे साथ उडते हुए

आसमानी दुकानों से ढूंढ के पिघलादु मैं चाँद ये

तुम्हारे इन कानो में पह्ना भी दू बूंदे बना

फिर ये मैं सोच लू समझेगी तू जो मैं कह सका

पर डरता हू अभी ना ये तू पूछे कही

क्यों लाये हो ये ..क्यों लाये हो ...ये ...यु ही

Extermely melodious song from "Tanu weds Manu"... Mohit sung his heart out...composed by new talent Krsna and sublime lyrics by Rajshekhar. Could not resist sharing this beautifully writen song.

Friday, November 20, 2009

Poetry Workshop With Gulzar... some very good poetry by humble folks..

one from this workshop that's a gem..

नयी नज्मे कहा करे कोई, कुछ ना समझे खुदा करे कोई,

तुम भी ग़ालिब से कम नही अल्वी, तुम ना मानो तो क्या करे कोई....



Sunday, August 09, 2009

A beautiful poem from Govind Nihlani's 'Ardh Satya'

चक्रव्यूह मे घुसने से पहले
कौन था मैं और कैसा था
यह मुझे याद ही ना रहेगा

चक्रव्यूह मे घुसने के बाद
मेरे और चक्रव्यूह के बीच
सिर्फ़ एक जानलेवा निकटता थी
इसका मुझे पता ही न चलेगा

चक्रव्यूह से निकलने के बाद
मैं मुक्त हो जाऊँ भले ही
फ़िर भी चक्रव्यूह की रचना मे
फर्क ही ना पड़ेगा

मरुँ या मारू
मारा जाऊं या जान से मार दूँ
इसका फ़ैसला कभी ना हो पायेगा

सोया हुआ आदमी जब
नींद से उठ कर चलना शुरू करता हैं
तब सपनों का संसार उसे
दुबारा दिख ही नही पायेगा

उस रौशनी में जो निर्णय की रौशनी हैं
सब कुछ समान होगा क्या?

एक पलडे में नपुंसकता
एक पलडे में पौरुष
और ठीक तराजू के कांटे पर
अर्ध सत्य






Thursday, June 05, 2008

Eloisa to Abelard -- Alexander Pope

How happy is the blameless vestal's lot!
The world forgetting, by the world forgot.
Eternal sunshine of the spotless mind!
Each pray'r accepted, and each wish resign'd;



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